
एक-एक पत्ता साथ छोड़ जाता है, पेड़ खड़ा है वहीँ खड़ा रह जाता है।
आती हैं शाख पर फिर पत्तियां नई, बनते बन जाती है फिर कहानियां कई।
बारिश धूप आँधियों की मार सह लेता है फिर भी वो कई बार,
पर इन बिखरी पत्तियों को कैसे समेटे, खड़ा बस सोचता रह जाता है बार बार।
कोई अपना ही होता है जो इन पत्तियों के कूड़े को बुहार कर मेहरबानी करता है।
वरना तो पेड़ खड़ा फिर बारिश और हवाओं के थपेड़ों का इंतज़ार करता है।
सोचता है आएगी हरियाली फिर से नई, जी लेंगे ख़ुशी में उसके साथ।
पर वो भूलता नहीं इस बार की खुशियों का होगा कुछ महीनों का ही साथ।
पतझड़ फिर बसंत, जीवन का भी कुछ इसी तरह का ही है हिसाब,
कभी बना दिया जाता हूँ फ़कीर और कभी नवाबों का नवाब।
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