Aug 6, 2010

साईकिल की सवारी












साईकिल की सवारी, जब दूसरे करते हैं तो लगती है प्यारी।
वरन स्वयं चलायें तो लगती है बेगारी।

अरे साहब ! साइकिल चलाना कोई आसान काम नहीं है।
जो इसका पूर्ण नियंत्रण जानता है, सच्चा वीर वही है।

ज़माने पहले की बात है, मन में आया साईकिल चलाना सीखें।
साईकिल चला स्वावलंबी बने और टाँगे की सवारी पर दिखें।

टाँगे के पैसे भी बचेंगे और साईकिल पर हम खूब जचेंगे।
टाँगे का इंतजार भी करना पड़ेगा और फिट भी रहेंगे।

इसी धुन में हम चल दिए अपने वाहन की खोज में।
सोचा की काश हमें भी मिल जाता ये वाहन दहेज़ में।

इसी उधेड़बुन में एक साईकिल की बड़ी दुकान दिख गई।
भिन्न-भिन्न मॉडल देखकर हमारी भी आँखे रुक गई।

दुकानदार से हमने फिर मॉडलों के दाम की तक़रीर की।
कुछ समय बात लगा शायद हमें दुकान ढूंढनी पड़े फ़कीर की।

फिर ध्यान आया और हमने जगडू की दुकान को रुख किया।
साहब, इस शहर मैं जगडू की विज्ञान ने कईयों को सुख दिया।

विनम्रता पूर्वक हमनें जगडू से अपने लिए वाहन का निवेदन किया।
जगडू ने भी हमारे निवेदन में अपना वरद-हस्त संवेदन दिया।

और कहा कल सुबह आयियें और अपने वाहन पर विहार कीजिये।
आहा! कितना सुखद और सुलभ जगडू का विज्ञान देखिये।

पहुँच गए प्रातः जगडू जी से वाहन का वरदान माँगने।
देख सुचलित वाहन को लगा हमारा भी स्वाभिमान जागने।

पैसों की कामाजोर के बाद ले आय अद्भुत वाहन को घर।
पुष्पांजलि अर्पित कर अपने भावी सेवक को विश्राम दिया उसी पहर।

जब निद्रान्दित हुए तो देखा हम साईकिल पर गगन विहार कर रहे हैं।
और साडी दुनियावाले हमें बड़े सम्मान के साथ स्तुति कर रहे हैं।

हम मामूली क्लर्क से साइकलेश्वर स्वामी बन चुके थे।
उफ़ ! स्वप्न टूटा और देखा घड़ी में बज चुके थे।

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