
अपना अस्तित्व उनमें खोज रहा
हूँ,शायद अपनी हदें सही पहचानता हूँ।
बहुत सोचा ये करूँ, और अपना हाथ आगे किया,
लेकिन हर बार की तरह अकर्मण्यता ने ही साथ दिया।
पता नहीं कब दैनिक स्वप्न से बाहर निकलूंगा,
और अपने हांथों से ही अपनी किस्मत लिखूंगा।
परन्तु इसके सुख को त्यागना इतना आसन नहीं है,
क्योकि इसकी छाया में कोई धुप से परेशान नहीं है।
सब जानते है आलस्य अकर्मण्यता का लंगोटिया यार है,
लेकिन जिसे इससे प्यार, उसकी किस्मत में अकर्मण्यता की मार है।
आलस्य आत्मा-नियंत्रण की कमी की पहचान है,
बड़े से बड़ा मनुष्य इसकी पकड़ से अनजान है।
जिसने इसे त्यागा, उसका भाग्य जगा।
आत्मा-नियंत्रण पुरुषत्व की संतिति है,
इसका ज्ञानी जो, उसकी प्रबल मति है।
अज्ञानता, आत्म-उद्दंडता का मित्र है,
इसकी घनिष्टता अजानी अटल और विचित्र है।
तो मित्रों ज्ञान बढाओ और आत्मा संकलन करो,
आत्मा-नियंत्रण से अपने पुरुषत्व की पहचान करो।
पुरुषत्व ही अकर्मण्यता की मुक्ति है,
और यही मनुष्य की सत्य शक्ति है।
परन्तु ज्ञान कहाँ है, कहाँ इसका दर्शन सुनिश्चित है,
इसका ज्ञान पाना ही कठिन है और कल्पना अनिश्चित है।
संतो से सुना है, और अपने अनुभव से बतलाता हूँ,
ज्ञान अंतर्मन में है, और यह ज्ञान ही मैं जताता हूँ।
तो उठो और अन्तेर्मन को जानो, अपने आप को पहचानो,
सृजन करो अपनी सृष्टि का और अपना अस्तित्व जानो।